द्विजेन्द्र "द्विज"

द्विजेन्द्र "द्विज" एक सुपरिचित ग़ज़लकार हैं और इसके साथ-साथ उन्हें प्रख्यात साहित्यकार श्री सागर "पालमपुरी" के सुपुत्र होने का सौभाग्य भी प्राप्त है। "द्विज" को ग़ज़ल लिखने की जो समझ हासिल है, उसी समझ के कारण "द्विज" की गज़लें देश और विदेश में सराही जाने लगी है। "द्विज" का एक ग़ज़ल संग्रह संग्रह "जन-गण-मन" भी प्रकाशित हुआ है जिसे साहित्य प्रेमियों ने हाथों-हाथ लिया है। उनके इसी ग़ज़ल संग्रह ने "द्विज" को न केवल चर्चा में लाया बल्कि एक तिलमिलाहट पैदा कर दी। मैं भी उन्ही लोगों में एक हूं जो "द्विज" भाई क़ी गज़लों के मोहपाश में कैद है। "द्विज" भाई की ग़ज़लें आपको कैसी लगी? मुझे प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी!
********************प्रकाश बादल************************

Wednesday, 24 December 2008

ग़ज़ल

Posted by Prakash badal

आइने कितने यहाँ टूट चुके हैं अब तक।

आफ़रीं उन पे जो सच बोल रहे हैं अब तक।


टूट जाएँगे मगर झुक नहीं सकते हम भी,

अपने ईमाँ की हिफ़ाज़त में तने हैं अब तक।


रहनुमा उनका वहाँ है ही नहीं मुद्दत से,

क़ाफ़िले वाले किसे ढूँढ रहे हैं अब तक।


अपने इस दिल को तसल्ली नहीं होती वरना,

हम हक़ीक़त तो तेरी जान चुके हैं अब तक।


फ़त्ह कर सकता नहीं जिनको जुनूँ मज़हब का,

कुछ वो तहज़ीब के महफ़ूज़ क़िले हैं अब तक।


उनकी आँखों को कहाँ ख़्वाब मयस्सर होते,

नींद भर भी जो कभी सो न सके हैं अब तक।


देख लेना कभी मन्ज़र वो घने जंगल का,

जब सुलग उठ्ठेंगे जो ठूँठ दबे हैं अब तक।


रोज़ नफ़रत की हवाओं में सुलग उठती है,

एक चिंगारी से घर कितने जले हैं अब तक।


इन उजालों का नया नाम बताओ क्या हो,

जिन उजालों में अँधेरे ही पले हैं अब तक।


पुरसुकून आपका चेहरा, ये चमकती आँखें,

आप भी शहर में, लगता है , नये हैं अब तक।


ख़ुश्क़ आँखों को रवानी ही नहीं मिल पाई,

यूँ तो हमने भी कई शे’र कहे हैं अब तक।


दूर पानी है अभी प्यास बुझाना मुश्किल,

और ‘द्विज’! आप तो दो कोस चले हैं अब तक।

11 comments:

"अर्श" said...

द्विज जी नमस्कार,
बहोत ही खूब ग़ज़ल लिखी है आपने नयापन के साथ साथ देश भक्ति से लबरेज है बहोत ही उम्दा ग़ज़ल पढ़ने को मिला ....

आभार
अर्श

अशोक मधुप said...

बहुत बढियां गजल। बधाई

mehek said...

waah bahut achhi gazal badhai,har sher awesome just awesome

गौतम राजरिशी said...

ये जो इतनी मुश्किल रदिफ़ों को ले कर भी इतनी आसानी से इतनी बढ़िया गज़ल कह डालने का जो द्विज जी का अंदाज है,वो तमाम "वाह-वाही" से परे है...और हम तो वैसे भी इन गज़लों में डूब-उतर कर नयी बातें नये तजुर्बे सीखते रहते हैं..
देख लेना कभी मन्जर वो घने जंगल का,जब सुलग उठ्ठेंगे जो ठूंठ दबे हैं अब तक...कोई जवाब है इन शेरों का?

manu said...

जी साहब हम भी इस शहर में नए ही हैं पर आपको देखने के बाद अब ख़ुद को अजनबी सा महसूस नहीं कर रहे
हाँ , थोडा रश्क होता है आपसे ..के अआप एक एक लम्हा आज में इतनी आसानी से जी लेते हैं .....
हमसे भी हमारा कल छुड़वा दीजिये ना....??

Manoshi said...

आपकी ग़ज़लों की तारीफ़ अब हम क्या करें, मगर कितनी मुश्किल ग़ज़ल आप कितनी आसानी से कह लेते हैं। हम अभी सीख ही रहे हैं, आपके लिखने से हमें मार्गदर्शन ही मिलता है।

सतपाल said...

देख लेना कभी मन्जर वो घने जंगल का,
जब सुलग उठ्ठेंगे जो ठूंठ दबे हैं अब तक,

aisa she'r sadiyoN me sunne ko milta hai.
har she'r lajwab hai, mai to khud khud unka riNhee hooN .

saadar khyaal

navneet sharma said...

Dwij Sahab, aik aur ustadana ghazal ke liye mubaarik.

navneet

Harkirat Haqeer said...

द्विज जी, क्‍या कहूँ...बस... ''सुभा..न अल्‍लाह!''

manu said...

भाई जी ,
नया साल आपको बार बार मुबारक हो......
आज के हालात यूँ ही बयान करती रहे आपकी लेखनी........

अल्पना वर्मा said...

उनकी आँखों को कहाँ ख़्वाब मयस्सर होते,

नींद भर भी जो कभी सो न सके हैं अब तक।

yahan to gazalon ka khajana hai....bahut hi behtareen gazal lagi...
bahut bahut badhayee..

[baqi bhi padhungi -dobara aa kar]