द्विजेन्द्र "द्विज"

द्विजेन्द्र "द्विज" एक सुपरिचित ग़ज़लकार हैं और इसके साथ-साथ उन्हें प्रख्यात साहित्यकार श्री सागर "पालमपुरी" के सुपुत्र होने का सौभाग्य भी प्राप्त है। "द्विज" को ग़ज़ल लिखने की जो समझ हासिल है, उसी समझ के कारण "द्विज" की गज़लें देश और विदेश में सराही जाने लगी है। "द्विज" का एक ग़ज़ल संग्रह संग्रह "जन-गण-मन" भी प्रकाशित हुआ है जिसे साहित्य प्रेमियों ने हाथों-हाथ लिया है। उनके इसी ग़ज़ल संग्रह ने "द्विज" को न केवल चर्चा में लाया बल्कि एक तिलमिलाहट पैदा कर दी। मैं भी उन्ही लोगों में एक हूं जो "द्विज" भाई क़ी गज़लों के मोहपाश में कैद है। "द्विज" भाई की ग़ज़लें आपको कैसी लगी? मुझे प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी!
********************प्रकाश बादल************************

Wednesday, 3 December 2008

ग़ज़ल

Posted by Prakash badal

बराबर चल रहे हो और फिर भी घर नहीं आता
तुम्हें यह सोचकर लोगो, कभी क्या डर नहीं आता

अगर भटकाव लेकर राह में रहबर नहीं आता,
किसी भी क़ाफ़िले की पीठ पर ख़ंजर नहीं आता


तुम्हारे ज़ेह्न में गर फ़िक्र मंज़िल की रही होती,
कभी भटकाव का कोई कहीं मंज़र नहीं आता

तुम्हारी आँख गर पहचान में धोखा नहीं खाती,
कोई रहज़न कभी बन कर यहाँ रहबर नहीं आता

लहू की क़ीमतें गर इस क़दर मन्दी नहीं होतीं,
लहू से तर—ब—तर कोई कहीं ख़ंजर नहीं आता।

अगर गलियों में बहते ख़ून का मतलब समझ लेते,
तुम्हारे घर के भीतर आज यह लशकर नहीं आता।

तुम्हारे दिल सुलगने का यक़ीं कैसे हो लोगों को,
अगर सीने में शोला है तो क्यों बाहर नहीं आता।

6 comments:

नीरज गोस्वामी said...

"तुम्हारी आँख गर पहचान में धोखा नहीं खाती
कोई रहज़न कभी बन कर यहाँ रहबर नहीं आता
तुम्हारे दिल सुलगने का यकीं कैसे हो लोगों को
अगर सीने में शोला है तो क्यूँ बाहर नहीं आता"
ऐसे लाजवाब शेरों से सजी द्विज साहेब की ये ग़ज़ल कमाल की है....उनका अपना एक अनूठा अंदाज़ है जो सबसे अलग है और हमें बार बार उन्हें पढने को मजबूर करता है...इश्वर उनसे ऐसी और बहुत सी ग़ज़लें लिखवाता रहे...ये ही प्रार्थना है...
नीरज

mehek said...

लहू की क़ीमतें गर इस क़दर मन्दी नहीं होतीं,
लहू से तर—ब—तर कोई कहीं ख़ंजर नहीं आता।

अगर गलियों में बहते ख़ून का मतलब समझ लेते,
तुम्हारे घर के भीतर आज यह लशकर नहीं आता।
har lafz jaise chingari jala gaya,bujhi shama ko dil mein jala gaya.
har sher kabile tariff ,bahut sundar gazal badhai.

"अर्श" said...

द्विज जी नमस्कार ,
बहोत ही बढ़िया ग़ज़ल पेश करी है आपने बहोत खूब ढेरो बधाई आपको साहब........

dwij said...

भाई ’अर्श’ जी
नमस्कार.
बहुत- बहुत शुक्रिया.
इस ब्लाग पर मेरी ग़ज़लें प्रिय भाई प्रकाश बादल जी प्रस्तुत करते हैं.
इसी बहाने आप जैसे मित्रों के साथ सम्पर्क बन रहा है.
द्विज

गौतम राजरिशी said...

गज़ब का मतला...और हर शेर कुछ इतने जबरद्स्त तरीके से क्लाईमेक्स पर पहुँच कर खत्म हो रहा है कि क्या कहने...
चाहे वो "किसी भी काफ़िले के पीठ पर" हो या "कोई रहजन कभी बन कर.." हो या "लहू से तर-ब-तर कोई कहीं खंजर.." और या फिर कहर ढ़ाता मकता का "अगर सीने में शोला है तो क्यों बाहर नहीं आता"

द्विज जी को दंडवत प्रणाम !

विनय said...

पढ़ा, शब्द प्रयोग अच्छा है

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चाँद, बादल और शाम
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