हज़ारों सदियों-सी लम्बी यही कथाएँ हैं
हर एक मोड़ पे जीवन के यातनाएँ हैं
इसीलिए यहाँ ऊबी सब आस्थाएँ हैं
पलों की बातें हैं पहरों की भूमिकाएँ हैं
सवाल सामने लाती है यही आज़ादी
‘बिछीं जो राहों में लाखों ही वर्जनाएँ हैं?’
दिखें हैं ख़ून के छींटे बरसती बूंदों में
ख़याल ज़ख़्मी हैं घायल जो कल्पनाएँ हैं
जहाँ से लौट के आने का रास्ता ही नहीं
वफ़ा की राह में ऐसी कई गुफ़ाएँ हैं
बस आसमान सुने तो सुने इन्हें यारो
पहाड़ जैसी दिलों में कई व्यथाएँ हैं
हसीन ख़्वाब मरेंगे नहीं यक़ीं जानो
उकेरती अभी सावन को तूलिकाएँ हैं
दुआ करो कहीं धरती पे भी बरस जाएँ
फ़लक़ पे झूम रहीं साँवली घटाएँ हैं
- ' विनय पत्रिका' से बोधित्सव
- 'चाय-घर' में बृजेश
- अक्षर जब शब्द बनते हैं
- अनुनाद
- अनुभुति
- अनुराग का 'सबद'
- अनूप सेठी
- अरुण आदित्य 'अ-आ'
- आलोक तोमर
- आशीष ऑलरॉऊंडर
- आशुतोष दुबे का 'मेरी दृष्टि'
- इन्दौर का जनवादी लेखक संघ
- उदय प्रकाश
- कबाड़खाना
- कुमार अंबुज
- कृत्या
- गौतम राजरिशी का "पाल के इक रोग नादाँ"
- तोतला
- धीरेश की 'ज़िद्दी धुन'
- नीरज गोस्वामी का ग़ज़ल संसार,"नीरज"
- नुक्कड़
- प्रत्यक्षा
- प्रथम
- प्रदीप की 'भोर'
- फूटपाथ' से देव प्रकाश
- मनीषा पांडे का 'बेदख़ल की डायरी'
- महावीर शर्मा का 'महावीर'
- महेन का 'हलंत'
- मोहल्ला
- योगेन्द्र का 'शब्द सृजन
- रंजन राजन का 'ग़ुस्ताख़ी माफ़
- रचनाकार
- रवींद्र का 'हरा कोना'
- लाल्टू
- लिख डाला
- विष्णु नागर का 'कवि'
- वैतागवाड़ी
- शैलेश भारतवासी का 'हिन्द-युग्म'
- संशयात्मा पर' प्रमोद रंजन
- सतपाल ख़्याल का "आज की ग़ज़ल"
- समर्थ वशिष्ठ
- साहित्य कुंज
- साहित्य शिल्पी
- सुशील कुमार का 'पतझड़'
- सृजन गाथा
- हरकीरत हक़ीर की कविताएं
- हिमाचल मित्र
- ..कोई हादसा दे जाएगा /द्विजेन्द्र 'द्विज'/15/3/2009 (1)
- इसी तरह से ये........../द्विज (1)
- एक और ग़ज़ल/द्विजेन्द्र"द्विज"/21/1/2009 (1)
- कभी इनकार चुटकी में.../द्विज/10/4/2009 (1)
- कहां पहुँचे सुहाने..../द्विज/29/9/2009 (1)
- क़ाफ़िला है तू....../द्विजेन्द्र"द्विज" / 21/3/2009/द्व (1)
- काफिलों में जब कभी गद्दारियां रहने लगें/द्विज/6/10/2009 (1)
- गज़ल (1)
- जन्म दिवस द्विज/10/10/2009 (1)
- जो लड़े जीवन की सब संभावनाओं के ख़िलाफ/द्विज/4/1/2009 (1)
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द्विजेन्द्र "द्विज"
********************प्रकाश बादल************************
Saturday, 21 August 2010
Saturday, 24 April 2010
इसी तरह से ये काँटा निकाल देते हैं
हम अपने दर्द को ग़ज़लों में ढाल देते हैं
हमारी नींदों में अक्सर जो डालती हैं ख़लल
वो ऐसी बातों को दिल से निकाल देते हैं
हमारे कल की ख़ुदा जाने शक़्ल क्या होगी
हर एक बात को हम कल पे टाल देते हैं
कहीं दिखे ही नहीं गाँवों में वो पेड़ हमें
बुज़ुर्ग साये की जिनके मिसाल देते हैं
कमाल ये है वो गोहरशनास हैं ही नहीं
जो इक नज़र में समंदर खंगाल देते है
वो सारे हादसे हिम्मत बढ़ा गए ‘द्विज’ की
कि जिनके साये ही दम-ख़म पिघाल देते हैं
Friday, 9 October 2009
ज़ाहिर तौर पर मीटर से बाहर लिखता हूँ लेकिन फिर भी "द्विज" भाई और उनकी ग़ज़लों का दीवाना तो हूँ ही! 10 अक्तूबर का दिन उनका जन्म दिवस है तो मैंने सोचा कि सभी मित्रों से संदेश लेकर उन्हें बधाई देने से बढ़िया और क्या रहेगा!
ज़ाहिर है कि हिन्दी ग़ज़लों जो झरना द्विज भाई के घर से निकलता है उसका प्रवाह दूर-दूर तक जाता है। इस युवा ग़ज़लकार को इनके जन्मदिवस मेरी ओर से ढेरों बधाई और मेरी कामना कि ग़ज़लों का यह उदगम इसी प्रकार अच्छी- और धारदार ग़ज़लें देता रहे और ईश्वर इस युवा ग़ज़लकार को लम्बी और स्वस्थ उम्र दराज़ करे।

इस अवसर पर प्रस्तुत है द्विज भाई की एक ग़ज़ल और कुछ साहित्यिक मित्रों के संदेश “ यद्यपि ग़ज़ल पहले पढ़वाई जा चुकी है, फिर भी मौके के अनुसार दोबारा प्रस्तुत की जा रही है ये “द्विज” की ग़ज़ल “द्विज” के लिए ही

नये साल में
ज़िन्दगी हो सुहानी नये साल में
दिल में हो शादमानी नये साल में
सब के आँगन में अबके महकने लगे
दिन को भी रात-रानी नये साल में
ले उड़े इस जहाँ से धुआँ और घुटन
इक हवा ज़ाफ़रानी नये साल में
इस जहाँ से मिटे हर निशाँ झूठ का
सच की हो पासबानी नये साल में
है दुआ अबके ख़ुद को न दोहरा सके
नफ़रतों की कहानी नये साल में
बह न पाए फिर इन्सानियत का लहू
हो यही मेहरबानी नये साल में
राजधानी में जितने हैं चिकने घड़े
काश हों पानी-पानी नये साल में
वक़्त ! ठहरे हुए आँसुओं को भी तू
बख़्शना कुछ रवानी नये साल में
ख़ुशनुमा मरहलों से गुज़रती रहे
दोस्तों की कहानी नये साल में
हैं मुहब्बत के नग़्मे जो हारे हुए
दे उन्हें कामरानी नये साल में
अब के हर एक भूखे को रोटी मिले
और प्यासे को पानी नये साल में
काश खाने लगे ख़ौफ़ इन्सान से
ख़ौफ़ की हुक्मरानी नये साल में
देख तू भी कभी इस ज़मीं की तरफ़
ऐ नज़र आसमानी ! नये साल में
कोशिशें कर, दुआ कर कि ज़िन्दा रहे
द्विज ! तेरी हक़-बयानी नये साल में.

द्विज भाई के जन्म दिवस पर यूं मिली शुभकामनाएँ:

हर दिल अजीज़ भाई समीर लाल की बधाईयां सबसे पहले न मिले ऐसा कैसे हो सकता है भला। समीर जी ने कहा :
प्रिय प्रकाश भाई,
द्विज जी जन्म दिन के बारे में जानकर खुशी हुई. वो शायद मुझे जानते भी न होंगे लेकिन हम तो शुरु से ही उनके व्यक्तित्व एवं गज़लों के मुरीद हैं. अन्य गज़लकारों का वो जिस तरह निःस्वार्थ मार्गदर्शन करते हैं, वह सराहनीय एवं अनुकरणीय है. उन्हें साधुवाद.ऐसे शुभ अवसर पर मैं उन्हें अपनी बधाईयाँ एवं हार्दिक शुभकामनाएँ देता हूँ.उनकी गज़लों का हमेशा ही इन्तज़ार रहता है.
सादर
समीर लाल
कविता कोश के सम्पादक अनिल जनविजय ने द्विज भाई को एक कविता के माध्यम से बधाई कुछ इस प्रकार भेजी है:प्रिय द्विज जी को
जिन्हें हम उतना ही प्यार करते हैं
जितना कविता को करते हैं
जिन्हें हम उतना ही प्यार करते हैं
जितना अपने बच्चों को करते हैं
जन्मदिन पर हार्दिक मंगलकामनाएँ।

कवियत्री और सक्रीय ब्लॉगर रंजना भाटिया ने द्विज को बधाई कुछ इस प्रकार से दी है:
“द्विजेंद्र द्विज जी को जन्मदिन की हार्दिक बधाई ईश्वर उनकी हर मनोकामना पूर्ण करे और वह यूँ ही अच्छी अच्छी गजले लिखते रहे “।

युवा ग़ज़लकार प्रकाश सिंह अर्श ने भी द्विज भाई को बधाई दी लेकिन उनकी मेल ग़लती से डिलीट हो गई लेकिन मैने जो पढा उसमें प्रकाश अर्श ने द्विज भाई को अच्छी ग़ज़लें लिखने के लिए बधाई दी है और द्विज भाई की दीर्घायु की कामना की है। प्रकाश भाई मुझे माफ करेंगे जल्दबाज़ी में आपकी टिप्पणी डिलीट हो गई।
प्रकाश जी ......... ये तो बहुत ही अच्छी खबर दी है आपने ...........द्विज जी को हमारी तरफ से जनम दिन की बहुत बहुत शुभकामनाएं .......... भगवान् उनकी कलम में और जादू भरे और हम उनको पढ़ कर आनंदित होते रहें।

चर्चित महिला ब्लॉगर रंजना ने भी द्विज को जन्म दिवस की बधाई कुछ इस प्रकार दी है :
आदरणीय प्रकाश जी ,सूचित करने के लिए बहुत बहुत आभार.....द्विज जी को हमारी ओर से जन्मदिन की अनंत शुभकामनायें दे दें.
सादर
रंजना
सभी के प्यारे और सक्रिय ब्लॉगर, ग़ज़लकार नीरज गोस्वामी ने कहा कि :प्रकाश जी जान कर बहुत ख़ुशी हुई की भाई द्विज जी का जन्म दिन कल याने दस अक्तूबर को है...विचित्र संजोग हैं जिन दो गुणी जनों ने मुझे ग़ज़ल की पट्टी पढाई उनका जन्म दिन एक दिन के अंतर पर ही आता है याने द्विज जी का दस को पंकज सुबीर जी का ग्यारह अक्तूबर को. द्विज जी को जनम दिन की बहुत बहुत बहुत बधाई...इश्वर उन्हें दुनिया की सारी खुशियाँ अता करे...एक शेर है किसी का उनकी नज़र करता हूँ:
खुदा तो मिलता है इन्सां नहीं मिलता
ये वो शै है जो देखी कहीं कहीं मैंने
द्विज जी इन्सान के रूप में फ़रिश्ता हैं और आज की दुनिया में इस तरह के इन्सान सिर्फ किस्से कहानियों में ही मिलते हैं...उनकी ये सादगी और सबको प्यार बांटने की आदत हमेशा कायम रहे.
युवा कवि हिमांशु पांडे ने तो द्विज भाई की एक अंग्रेज़ी कविता का अनुवाद भी कर डाला और अपनी बधाई कुछ इस प्रकार दी :प्रकाश जी,आदरणीय द्विज जी को जन्मदिवस की हार्दिक शुभकामनायें । चिट्ठाकारी में आया तो द्विज जी की गजलों से एक आश्वस्ति भाव जागा , रचनाधर्मिता के अंकुर फूटे इस मन विजन में । द्विज जी का स्नेह सदैव आच्छादित करता रहा है मुझे । सरोकार से जुड़ी रचनाधर्मिता, मानवीयता से संपृक्त रचनाधर्मिता एवं निरंतर शुभ भाव संचारित रचनाधर्मिता द्विज जी की पहचान है, और यही कारण है कि द्विज जी मेरे अनन्य प्रिय हैं । पुनश्च द्विज जी को जन्मदिवस की हार्दिक शुभकामनायें । ईश्वर उन्हें दीर्घायु करे । हिमांशु जी द्वारा अनुवाद की गई द्विज की कविता प्रस्तुत है :
चोटियां और गुफ़ायें (Cliffs and Caverns)
ऊंची कठोर शुष्क गिरि-चोटियां
अपने उन्नतशिर होने की डींग हांकतीं हैं, और
उषाकाल से धेनुधूलि बेला तक
रवि-आतप का शोषण करती
ऊबती-पचती रहती हैं ।
सूर्य किरणों का उज्जवल हास
अभिशप्त शैल-कंदराओं को
कभी सुलभ नहीं होगा? कभी नही ।
हमें तो समतल धरा की गोद चाहिये
कौन जाय ऊंची चोटियों का कलेजा विदीर्ण करने
और उन्हें ध्वस्त कर
गुफ़ा-गर्भ की अधोगति प्रदान करने,
वह उनकी शाश्वत नियति है
वे सोखती ही रहेंगी धूप को
और बघारती ही रहेंगी
अपने उन्नत श्रृंग की शेखी,
गुफ़ायें अंध-तमिस्रा में ठिठुरती ही रहेंगी.
वैसे इस संदर्भ में यदि द्विज जी से अनुमति लेनी ठीक और आवश्यक हो तो आप ले लेंगे । मूल कविता भी उनसे प्राप्त की जा सकती है । शेष आपकी इच्छा ।
आपका,
हिमांशु
| कुछ शुभकामनाएं देर से मिली लेकिन इन्हें प्रकाशित करना ज़रूरी लगा |
|---|

युवा कवि,पत्रकार और द्विज भाई के अनुज नवनीत शर्मा कहते हैं:
पिता तुल्य,प्रेरणापुंज खुद तकलीफ सहकर भी छोटों को सुख देने वाले ,क़ॉलेज के दिनों में जेब ख़र्च बचाकर सारिका ख़रीदकर पढ़ने वाले और मुझे भी उसकी आदत डालने वाले आदरणीय भाई द्विज को जन्म दिन की हार्दिक शुभकामनाएं।
ग़ज़लकार माधव कौशिक जी ने भी द्विज भाई को जन्म दिन के शुभकामनाएं भेजी है माधव जी ने कुछ यूँ लिखा है:भाई द्विज को जन्म दिन की लाख-लाख बधाई. भगवान करे वे इसी तरह अदब के आसमान पर चमकते रहें ।
Tuesday, 6 October 2009
हर क़दम पर खौफ़ की सरदारियाँ रहने लगें
काफिलों में जब कभी ग़द्दारियाँ रहने लगें
नीयतें बद और कुछ बदकारियाँ रहने लगें
सरहादों पर क्यों न गोलाबारियाँ रहने लगें
हर तरफ़ लाचारियाँ,दुशवारियाँ रहने लगें
सरपरस्ती में जहाँ मक्कारियाँ रहने लगें
हर तरफ़ ऐसे हक़ीमों की अजब—सी भीड़ है
चाहते हैं जो यहाँ बीमारियाँ रहने लगें
फिर ख़ुराफ़त के जंगल ही क्यों न उग आएँ वहाँ
ज़ेह्न में अकसर जहाँ बेकारियाँ रहने लगें
क्यों न सच आकर हलक में ही अटक जाए कहो
गरदनों पर जब हमेशा आरियाँ रहने लगें
उनकी बातों में है जितना झूठ सब जल जाएगा
आपकी आँखों में गर चिंगारियाँ रहने लगें
है महक मुमकिन तभी सारे ज़माने के लिए
सोच में ‘द्विज’, कुछ अगर फुलवारियाँ रहने लगें.
Tuesday, 29 September 2009
कहाँ पहुँचे सुहाने मंज़रों तक
वो जिनका ध्यान था टूटे परों तक
जिन्हें हर हाल में सच बोलना था
पहुँचना था उन्हीं को कटघरों तक
लकीरों को बताकर साँप अकसर
धकेला उसने हमको अजगरों तक
नज़र अंदाज़ चिंगारी हुई थी
सुलगकर आग फैली है घरों तक
ये कौन आया हमारी गुफ्तगू में
दिलों की बात पहुँची नश्तरों तक
उसे ही नाख़ुदा कहते रहे हम
हमें लाता रहा जो गह्वरों तक
ज़रा तैरो, बचा लो ख़ुद को , देखो
लो पानी आ गया अब तो सरों तक
सलीक़ा था कहाँ उसमें जो बिकता
सुख़न पहुँचा नहीं सौदागरों तक
निशाँ तहज़ीब के मिलते यक़ीनन
कोई आता अगर इन खण्डरों तक
नहीं अब ज़िन्दगी मक़सद जब उसका
तो महज़ब लाएगा ही मक़बरों तक
निचुड़ना था किनारों को हमेशा
नदी को भागना था सागरों तक
बचीं तो कल्पना बनकर उड़ेंगी
अजन्मी बेटियाँ भी अम्बरों तक
अक़ीदत ही नहीं जब तौर ‘द्विज’ का
पहुँचता वो कहाँ पैग़म्बरों तक
Saturday, 25 July 2009
पंख कुतर कर जादूगर जब चिड़िया को तड़पाता है
सात समंदर पार का सपना , सपना ही रह जाता है
‘जयद्रथ’ हो या ‘दुर्योधन’हो सबसे उसका नाता है
अब अपना गाँडीव उठाते ‘अर्जुन’ भी घबराता है
जब सन्नाटों का कोलाहल इक हद से बढ़ जाता है
तब कोई दीवाना शायर ग़ज़लें बुन कर लाता है
दावानल में नए दौर के पंछी ने यह सोच लिया
अब जलते पेड़ों की शाख़ों से अपना क्या नाता है
प्रश्न युगों से केवल यह है हँसती-गाती धरती पर
सन्नाटे के साँपों को रह-रह कर कौन बुलाता है
सब कुछ जाने ‘ब्रह्मा’ किस मुँह पूछे इन कंकालों से
इस धरती पर शिव ताण्डव-सा डमरू कौन बजाता है
‘द्विज’! वो कोमल पंख हैं डरते अब इक बाज के साये से
जिन पंखों से आस का पंछी सपनों को सहलाता है।
Thursday, 21 May 2009
जितना दिखता हूँ मुझे उससे ज़ियादा न समझ
इस ज़मीं का हूँ मुझे कोई फ़रिश्ता न समझ
जो तक़ल्लुफ़ है उसे हर्फ़े-तमन्ना न समझ
मुस्कुराहट को मुहब्बत का इशारा न समझ
यह तेरी आँख के धोखे के सिवा कुछ भी नहीं
एक बहते हुए दरिया को किनारा न समझ
एक दिन चीर के निकलेंगे वो तेरी आँतें
वो भी इन्साँ हैं उन्हें अपना निवाला न समझ
वह तुझे बाँटने आया है कई टुकड़ों में
मुस्कुराते हुए शैताँ को मसीहा न समझ
जिन किताबों ने अँधेरों के सिवा कुछ न दिया
उन किताबों के उजाले को उजाला न समझ
छोड़ जाएगा तेरा साथ अँधेरे में यही
यह जो साया है तेरा इसको भी अपना न समझ
यह जो बिफरा तो डुबोएगा सफ़ीने कितने
तू इसे आँख से टपका हुआ क़तरा न समझ
है तेरे साथ अगर तेरे इरादों का जुनूँ
क़ाफ़िला है तू अभी ख़ुद को अकेला न समझ
तुझ से ही माँग रहा है वो तो ख़ुद अपना वजूद
ख़ुद भिखारी है उसे कोई ख़लीफ़ा न समझ
बढ़ कुछ आगे तो मिलेंगे तुझे मंज़र भी हसीं
इन पहाड़ों के कुहासे को कुहासा न समझ
साथ मेरे हैं बुज़ुर्गों की दुआएँ इतनी
मैं हूँ महफ़िल तू मुझे आज भी तनहा न समझ
शायरी आज भी उनकी है नई ‘द्विज’ ख़ुद को
ग़ालिब-ओ-मीर या मोमिन से भी ऊँचा न समझ









