द्विजेन्द्र "द्विज"

द्विजेन्द्र "द्विज" एक सुपरिचित ग़ज़लकार हैं और इसके साथ-साथ उन्हें प्रख्यात साहित्यकार श्री सागर "पालमपुरी" के सुपुत्र होने का सौभाग्य भी प्राप्त है। "द्विज" को ग़ज़ल लिखने की जो समझ हासिल है, उसी समझ के कारण "द्विज" की गज़लें देश और विदेश में सराही जाने लगी है। "द्विज" का एक ग़ज़ल संग्रह संग्रह "जन-गण-मन" भी प्रकाशित हुआ है जिसे साहित्य प्रेमियों ने हाथों-हाथ लिया है। उनके इसी ग़ज़ल संग्रह ने "द्विज" को न केवल चर्चा में लाया बल्कि एक तिलमिलाहट पैदा कर दी। मैं भी उन्ही लोगों में एक हूं जो "द्विज" भाई क़ी गज़लों के मोहपाश में कैद है। "द्विज" भाई की ग़ज़लें आपको कैसी लगी? मुझे प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी!
********************प्रकाश बादल************************

Tuesday, 6 October 2009

हर क़दम पर खौफ़ की सरदारियाँ रहने लगें
काफिलों में जब कभी ग़द्दारियाँ रहने लगें

नीयतें बद और कुछ बदकारियाँ रहने लगें
सरहादों पर क्यों न गोलाबारियाँ रहने लगें

हर तरफ़ लाचारियाँ,दुशवारियाँ रहने लगें
सरपरस्ती में जहाँ मक्कारियाँ रहने लगें

हर तरफ़ ऐसे हक़ीमों की अजब—सी भीड़ है
चाहते हैं जो यहाँ बीमारियाँ रहने लगें

फिर ख़ुराफ़त के जंगल ही क्यों न उग आएँ वहाँ
ज़ेह्न में अकसर जहाँ बेकारियाँ रहने लगें

क्यों न सच आकर हलक में ही अटक जाए कहो
गरदनों पर जब हमेशा आरियाँ रहने लगें

उनकी बातों में है जितना झूठ सब जल जाएगा
आपकी आँखों में गर चिंगारियाँ रहने लगें

है महक मुमकिन तभी सारे ज़माने के लिए
सोच में ‘द्विज’, कुछ अगर फुलवारियाँ रहने लगें.

12 comments:

आमीन said...

बहुत ही लाजवाब लिखा है आपने



http://dunalee.blogspot.com/

raj said...

क्यों न सच आकर हलक में अटक जाए कहो
गरदनों पर जब हमेशा आरियाँ रहने लगें....puri rachna khoobsurat hai...achha hai..aap ne jaldi likha...likhte rahe....

डॉ .अनुराग said...

अरसे बाद आमद हुई आपकी......ये शेर पर हमें बहुत भाया ...


उनकी बातों में है जितना झूठ सब जल जाएगा
आपकी आँखों में गर चिंगारियाँ रहने लगें

"अर्श" said...

बस सलाम करूँगा और कुछ कहने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं...


अर्श

venus kesari said...

उनकी बातों में है जितना झूठ सब जल जाएगा
आपकी आँखों में गर चिंगारियाँ रहने लगें


vaah kya baat hai

हिमांशु । Himanshu said...

"हर तरफ़ ऐसे हक़ीमों की अजब—सी भीड़ है
चाहते हैं जो यहाँ बीमारियाँ रहने लगें"

बहुत प्रासंगिक है यह । समाज का रीति-रिवाज बन गयी है यह आदत । आभार ।
पूरी गजल सुन्दर है ।

संजीव गौतम said...

जितने ख़ूबसूरत आप हैं उतनी ही ख़ूबसूरत ग़ज़ल. पूरी ग़ज़ल बहुत अच्छी है लेकिन ये मेरे मन का शेर है-
है महक मुमकिन तभी सारे ज़माने के लिए
सोच में ‘द्विज’, कुछ अगर फुलवारियाँ रहने लगें.

रंजना said...

हर तरफ़ ऐसे हक़ीमों की अजब—सी भीड़ है
चाहते हैं जो यहाँ बीमारियाँ रहने लगें


वाह वाह वाह !!! लाजवाब !!!

बहुत बहुत सही कहा आपने....बहुत ही सुन्दर ग़ज़ल...आभार.

Yogesh said...

क्या बात है द्विज भाई

काफिया देख कर मुझे लगा कि ज़्यादा शेर बनाने मुमकिन न होंगे

आपने न सिर्फ़ शेर बनाये, बल्कि बहुत ही खूबसूरत लव्ज़ों से उनको तराशा भी। !!

इस गज़ल के लिये वाह नहीं कह सकता !!!
काफी कम हो जायेगा।

Vijay Kumar Sappatti said...

dwij ji

mere paas koi shabd nahi hai ki main aapki gazalo ki tareef karun .. sab ki sab shaandar aur jaandar hai ...
saat samandar paar ka sapna ... bahut touchy hai ji ...

kahan tak pahunche suhane manjaro tak ... waah waah
main pahle kyon nahi aaya aap ke blog par bus isi baat ka afsos hai ..

regards

vijay
www.poemsofvijay.blogspot.com

दिगम्बर नासवा said...

क्यों न सच आकर हलक में ही अटक जाए कहो
गरदनों पर जब हमेशा आरियाँ रहने लगें...

lajawaab sher ......
dwij ji ke saamne kuch kahna .... bas mein nahi hamaare ..... kamaal bas kamaal .....

Himanshu Mohan said...

बहुत सुन्दर ! वाह!
आनन्द आ गया इस रचना को पढ़कर। एक छन्द कुछ टाइपिंग त्रुटि का शिकार लगता है,
"ख़ुराफ़त के जंगल" वाला