द्विजेन्द्र "द्विज"

द्विजेन्द्र "द्विज" एक सुपरिचित ग़ज़लकार हैं और इसके साथ-साथ उन्हें प्रख्यात साहित्यकार श्री सागर "पालमपुरी" के सुपुत्र होने का सौभाग्य भी प्राप्त है। "द्विज" को ग़ज़ल लिखने की जो समझ हासिल है, उसी समझ के कारण "द्विज" की गज़लें देश और विदेश में सराही जाने लगी है। "द्विज" का एक ग़ज़ल संग्रह संग्रह "जन-गण-मन" भी प्रकाशित हुआ है जिसे साहित्य प्रेमियों ने हाथों-हाथ लिया है। उनके इसी ग़ज़ल संग्रह ने "द्विज" को न केवल चर्चा में लाया बल्कि एक तिलमिलाहट पैदा कर दी। मैं भी उन्ही लोगों में एक हूं जो "द्विज" भाई क़ी गज़लों के मोहपाश में कैद है। "द्विज" भाई की ग़ज़लें आपको कैसी लगी? मुझे प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी!
********************प्रकाश बादल************************

Tuesday, 29 September 2009

कहाँ पहुँचे सुहाने मंज़रों तक
वो जिनका ध्यान था टूटे परों तक

जिन्हें हर हाल में सच बोलना था
पहुँचना था उन्हीं को कटघरों तक

लकीरों को बताकर साँप अकसर
धकेला उसने हमको अजगरों तक

नज़र अंदाज़ चिंगारी हुई थी
सुलगकर आग फैली है घरों तक

ये कौन आया हमारी गुफ्तगू में

दिलों की बात पहुँची नश्तरों तक

उसे ही नाख़ुदा कहते रहे हम
हमें लाता रहा जो गह्वरों तक

ज़रा तैरो, बचा लो ख़ुद को , देखो
लो पानी आ गया अब तो सरों तक

सलीक़ा था कहाँ उसमें जो बिकता
सुख़न पहुँचा नहीं सौदागरों तक

निशाँ तहज़ीब के मिलते यक़ीनन
कोई आता अगर इन खण्डरों तक

नहीं अब ज़िन्दगी मक़सद जब उसका
तो महज़ब लाएगा ही मक़बरों तक

निचुड़ना था किनारों को हमेशा
नदी को भागना था सागरों तक

बचीं तो कल्पना बनकर उड़ेंगी
अजन्मी बेटियाँ भी अम्बरों तक

अक़ीदत ही नहीं जब तौर ‘द्विज’ का
पहुँचता वो कहाँ पैग़म्बरों तक

14 comments:

राज भाटिय़ा said...

जिन्हें हर हाल में सच बोलना था
पहुँचना था उन्हीं को कटघरों तक
आप की रचना बहुत खुब सुरत लगी, गहरे भाव लिये.

धन्यवाद

दर्पण साह "दर्शन" said...

Waise to poori ghazal hi badhiya hai...
नज़र अंदाज़ चिंगारी हुई थी
सुलगकर आग फैली है घरों तक
निशाँ तहज़ीब के मिलते यक़ीनन
कोई आता अगर इन खण्डरों तक
dwij sir ye do sher bahut acche lage....
...bahut bahut acche !!

हिमांशु । Himanshu said...

बचीं तो कल्पना बनकर उड़ेंगी
अजन्मी बेटियाँ भी अम्बरों तक


एकदम से इतनी छोटी-छोटी पंक्तियों में चिन्तन का आकाश, भावना का अथाह और कथ्य का विस्तार समेटना आपके ही तो बस की बात है द्विज जी । अदभुत है यह पूरॊ गजल !

वाणी गीत said...

जिन्हें हर हाल में सच बोलना था
पहुँचना था उन्हीं को कटघरों तक
सलीक़ा था कहाँ उसमें जो बिकता
सुख़न पहुँचा नहीं सौदागरों तक
सुन्दर शब्द ...सार्थक अभिव्यक्ति ..!!

सतपाल said...

guru ji ko pranaam ,

prakash ji is misre ko sahi kar leN
typo hai

ये कौन आया गुफ़्तगू में
ek jagah mazhab ke spelling theek kar lijiye
ye hai...
kise le aaye ho tum guftgu me...

दिगम्बर नासवा said...

BAHOOT SAMAY BAAD DWIJ JI KI KOI GAZAL BADHI ..... DIL MEIN GAHRI UTAR GAYEE ..... LAJAWAAB SHER HAIN SAN KE SAB ...... JALDI JALDI SUNAAYA KAYEN DWIJ JI AUR AAPKI GAZAL BHI ...... HUM TO APKI GAZAL SUNNE KO BHI BETAB HAIN PRAKAASH JI ........

SANJEEV MISHRA said...

नज़र अंदाज़ चिंगारी हुई थी
सुलगकर आग फैली है घरों तक,
बचीं तो कल्पना बनकर उड़ेंगी
अजन्मी बेटियाँ भी अम्बरों तक.

बहुत ही सुन्दर द्विज साहब,
हर शेर ला जवाब.
बधाई स्वीकारें.

Yogesh said...

बहुत खूब, द्विज भाई,

कमाल किया है आपने

प्रकाश बादल said...

सभी मित्रों और स्नेहीजनों ने द्विज भाई की ग़ज़ल की जो सराहना की है उससे मुझे ताकत मिली है, और मेरा द्विज भाई की ग़ज़लों के प्रति पाग़लपन भी सार्थक हुआ है। आप सभी का आभार और आपसे उम्मीद है कि भविष्य में भी आप द्विज भाई की ग़ज़लों को इसी प्रकार पढ़ते रहेंगे,ऐसी उम्मीद है।

> भाई दिगम्बर नासवा का दिल से आभारी हूँ जो उन्होंने मेरी रचनाओं को भी सुनना चाहा है। उम्म्मीद है कि ग़ज़लों का झरना मेरे ज़ेहन में ठीक उसी तरह फूटे जिस तरह द्विज भाई के घर ग़ज़ल आती है। ज़ल्द ही मैं आपका स्नेहिल आग्रह पूरा करूँगा।

MUFLIS said...

अक़ीदत ही नहीं जब तौर ‘द्विज’ का
पहुँचता वो कहाँ पैग़म्बरों तक

dwij bhaai,,
namaskaar !

aisa nayaab sher ek arse ke baad
padhnaa naseeb hua hai...
aapke qalam se hamesha se hi
mut`aasir rahaa hooN
aapki ghazaleiN rooh ko
taskeen deti haiN...sach !!

mubarakbaad
---MUFLIS---

अर्शिया said...

गहरे भावों को बहुत ही सरल तरीके से बयां किया है आपने।
Think Scientific Act Scientific

raj said...

main bahut baar aake apka blog dekh jati thi..kuch naya nahi pati thi to lout jati thi..or ab jab aapne likha to mujhe etne din pata nahi chala..is gazal ko kitni baar padh chuki hun..kisi ik pankati ki ya ik sher ki tareef nahi kar sakti..puri rachna kitni achhi lagi.uske liye shabad kam hai....aap likhte raha kare....

sandhyagupta said...

Zeevan ki visangatiyon ko gazal ki ladiyon me bakhubi piroya hai.Badhai.

Himanshu Mohan said...

ये कमाल की रचना लगी-
वाह!
आना सफल हो गया।