द्विजेन्द्र "द्विज"

द्विजेन्द्र "द्विज" एक सुपरिचित ग़ज़लकार हैं और इसके साथ-साथ उन्हें प्रख्यात साहित्यकार श्री सागर "पालमपुरी" के सुपुत्र होने का सौभाग्य भी प्राप्त है। "द्विज" को ग़ज़ल लिखने की जो समझ हासिल है, उसी समझ के कारण "द्विज" की गज़लें देश और विदेश में सराही जाने लगी है। "द्विज" का एक ग़ज़ल संग्रह संग्रह "जन-गण-मन" भी प्रकाशित हुआ है जिसे साहित्य प्रेमियों ने हाथों-हाथ लिया है। उनके इसी ग़ज़ल संग्रह ने "द्विज" को न केवल चर्चा में लाया बल्कि एक तिलमिलाहट पैदा कर दी। मैं भी उन्ही लोगों में एक हूं जो "द्विज" भाई क़ी गज़लों के मोहपाश में कैद है। "द्विज" भाई की ग़ज़लें आपको कैसी लगी? मुझे प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी!
********************प्रकाश बादल************************

Saturday, 24 April 2010

इसी तरह से ये काँटा निकाल देते हैं
हम अपने दर्द को ग़ज़लों में ढाल देते हैं


हमारी नींदों में अक्सर जो डालती हैं ख़लल
वो ऐसी बातों को दिल से निकाल देते हैं


हमारे कल की ख़ुदा जाने शक़्ल क्या होगी
हर एक बात को हम कल पे टाल देते हैं


कहीं दिखे ही नहीं गाँवों में वो पेड़ हमें
बुज़ुर्ग साये की जिनके मिसाल देते हैं


कमाल ये है वो गोहरशनास हैं ही नहीं
जो इक नज़र में समंदर खंगाल देते है


वो सारे हादसे हिम्मत बढ़ा गए ‘द्विज’ की
कि जिनके साये ही दम-ख़म पिघाल देते हैं

22 comments:

शिव कुमार "साहिल" said...

हमारे कल की ख़ुदा जाने शक़्ल क्या होगी
हर एक बात को हम कल पे टाल देते हैं


आपका जवाब नहीं.........आपकी यह ग़ज़ल सभी की आत्मानुभूति को व्यक्त करती हैं.........बहुत खूब

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर गजल जी.
धन्यवाद

दिगम्बर नासवा said...

कहीं दिखे ही नहीं गाँवों में वो पेड़ हमें
बुज़ुर्ग साये की जिनके मिसाल देते हैं ..

जी कमाल की ग़ज़ल और बहुत ही लाजवाब शेर ... जैसे मिट्टी की सोंधी सोंधी महक आ रही हो ......

chandrabhan bhardwaj said...

अभी अभी 'ब्लॉगवाणी' खोल कर देखना शुरू ही किया था
कि आपका फोटो और गज़ल दीखि तो पढ़े बिना रहा ही
नही गया। अच्छी सुंदर गज़ल है बधाई -
हमारी नीदों में जो डालती है खलल
वो ऐसी बातों को दिल से निकाल देते हैं।
बहुत सुंदर बधाई

दिलीप said...

कहीं दिखे ही नहीं गाँवों में वो पेड़ हमें
बुज़ुर्ग साये की जिनके मिसाल देते हैं
bahut khoob...

अल्पना वर्मा said...

कहीं दिखे ही नहीं गाँवों में वो पेड़ हमें
बुज़ुर्ग साये की जिनके मिसाल देते हैं ..

बहुत उम्दा ग़ज़ल!

Yogesh said...

Kamaal !!!!

Har sher gazab hai bhai !!!

सुशीला पुरी said...

हमारे कल की ख़ुदा जाने शक़्ल क्या होगी
हर एक बात को हम कल पे टाल देते हैं
..............वाह
..............वाह
..............वाह

manu said...

हमारे कल की ख़ुदा जाने शक़्ल क्या होगी
हर एक बात को हम कल पे टाल देते हैं

गहरा शे'र ...
ज़्यादा गौर से देखें तो इसे पढ़ कर कल के नाम से ही घबराहट होने लगती है...

हमारे कल कि खुदा जाने शक्ल क्या होगी...


मगर मक्ता.....
जिंदगी को हिम्मत से लबालब भर देने वाला.....


वो सारे हादसे हिम्मत बढ़ा गए ‘द्विज’ की
कि जिनके साये ही दम-ख़म पिघाल देते हैं

be
बेहद asardaar...

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

अरे वाह, लाजवाब कर दिया आपने। बहुत बहुत बधाई।
--------
बूझ सको तो बूझो- कौन है चर्चित ब्लॉगर?
पत्नियों को मिले नार्को टेस्ट का अधिकार?

हिमांशु । Himanshu said...

द्विज जी की गज़लों को आहिस्ता-आहिस्ता पीता हूँ..भर-भर जाता हूँ !
इस शेर ने खूब आनन्द दिया -
"हमारे कल की ख़ुदा जाने शक़्ल क्या होगी
हर एक बात को हम कल पे टाल देते हैं "

Yogesh said...

हमारे कल की ख़ुदा जाने शक़्ल क्या होगी
हर एक बात को हम कल पे टाल देते हैं

WOW !!!!
kya likhaa hai, gazab...

Rajeev Bharol said...

द्विज जी,
बेहद सुंदर ग़ज़ल.

ये दो शेर खास तौर पर पसंद आये:

"हमारी नींदों में अक्सर जो डालती हैं ख़लल
वो ऐसी बातों को दिल से निकाल देते हैं

हमारे कल की ख़ुदा जाने शक़्ल क्या होगी
हर एक बात को हम कल पे टाल देते हैं "

sandhyagupta said...

कहीं दिखे ही नहीं गाँवों में वो पेड़ हमें
बुज़ुर्ग साये की जिनके मिसाल देते हैं

Aap hi ki kalam ho sakti hai.
Agli post ka intzaar hai.

Divya said...

कहीं दिखे ही नहीं गाँवों में वो पेड़ हमें
बुज़ुर्ग साये की जिनके मिसाल देते हैं ..

Time is moving fast. World is changing. People are growing selfish. All are busy with themselves. No time to look back and bother about others...

"Ab na rahe wo peene wale,
Ab na rahi wo madhushala."

विनोद कुमार पांडेय said...

सुंदर ग़ज़ल..

निर्मला कपिला said...

उस्तादाना शेरों पर बस निशब्द ही हूँ। अद्भुत है आपकी शायरी। शुभकामनायें।

इस्मत ज़ैदी said...

इसी तरह से ये काँटा निकाल देते हैं
हम अपने दर्द को ग़ज़लों में ढाल देते हैं

कमाल ये है वो गोहरशनास हैं ही नहीं
जो इक नज़र में समंदर खंगाल देते है

वाह ! बहुत ख़ूब !
वाक़ई यही स्थिति है कि सच्चे मोती निकालना तो दूर की बात है पहले उसे हम पहचानें तो

sandhyagupta said...

अगली पोस्ट का इंतज़ार है.

Majaal said...

कम लिखते है, पर लिखते है उम्दा,
ऐसे हुनर की 'मजाल' दाद देते है!

जितेन्द्र ‘जौहर’ Jitendra Jauhar said...

प्रकाश भाई,
मैं और द्विजेन्द्र भाई अनगिन पत्रिकाओं में साथ-साथ छपे हैं। उन्हें ब्लॉगिंग में देखकर और पढ़कर खुशी हुई।

मेरा ‘नमस्कार’ उन तक पहुँचा सकें तो आभारी रहूँगा। अग्रिम धन्यवाद स्वीकारें!

er.vidya singh said...

WAHH ..SIR ..KYA FARMAYA HAI