द्विजेन्द्र "द्विज"

द्विजेन्द्र "द्विज" एक सुपरिचित ग़ज़लकार हैं और इसके साथ-साथ उन्हें प्रख्यात साहित्यकार श्री सागर "पालमपुरी" के सुपुत्र होने का सौभाग्य भी प्राप्त है। "द्विज" को ग़ज़ल लिखने की जो समझ हासिल है, उसी समझ के कारण "द्विज" की गज़लें देश और विदेश में सराही जाने लगी है। "द्विज" का एक ग़ज़ल संग्रह संग्रह "जन-गण-मन" भी प्रकाशित हुआ है जिसे साहित्य प्रेमियों ने हाथों-हाथ लिया है। उनके इसी ग़ज़ल संग्रह ने "द्विज" को न केवल चर्चा में लाया बल्कि एक तिलमिलाहट पैदा कर दी। मैं भी उन्ही लोगों में एक हूं जो "द्विज" भाई क़ी गज़लों के मोहपाश में कैद है। "द्विज" भाई की ग़ज़लें आपको कैसी लगी? मुझे प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी!
********************प्रकाश बादल************************

Tuesday, 9 December 2008

ग़ज़ल

Posted by Prakash badal

नींव जो भरते रहे हैं आपके आवास की

ज़िन्दगी उनकी कथा है आज भी बनवास की


जिन परिन्दों की उड़ाने कुन्द कर डाली गईं,

जी रहे हैं टीस लेकर आज भी निर्वास की


तोड़कर मासूम सपने आने वाली पौध के ,

नींव रक्खेंगे भला वो कौन से इतिहास की


वह उगी, काटी गई, रौंदी गई, फिर भी उगी,

देवदारों की नहीं औकात है यह घास की


वह तो उनके शोर में ही डूब कर घुटता रहा,

क़हक़हों ने कब सुनी दारुण कथा संत्रास की


तब यक़ीनन एक बेहतर आज मिल पाता हमें,

पोल खुल जाती कभी जो झूठ के इतिहास की


आपके ये आश्वासन पूरे होंगे जब कभी,

तब तलक तो सूख जाएगी नदी विश्वास की


अनगिनत मायूसियों, ख़ामोशियों के दौर में,

देखना ‘द्विज’, छेड़ कर कोई ग़ज़ल उल्लास की

3 comments:

Manoshi said...

अच्छी गज़ल है। बधाई।

गज़ल (माशूका के साथ की गई गुफ़्तगू) का अर्थ इस नये ज़माने के साथ बदल रहा है। नई हवा, नये ख़यालों में ग़ज़ल पढ़ने को मिलती है जो हमें आजकल के हालात और अन्य विषयों पर सोचने पर मजबूर कर देती है।

chandrabhan bhardwaj said...

Bhai Dwij ji, Namaskar,
Aapki ghazal padi achchhi lagi badhai. 'aapke aashwaasanon....' wala misara padate samay bahar atakti hai. ek baar dekhen.
is sunder abhivyakti ke liye punah badhai

dwij said...

आदरणीय भाई चन्द्रभान भारद्वाज जी,
आपने मिसरे की सही और बेहतर सूरत सुझाई है:

आपके आश्वासनों के जब तलक अंकुर उगें
तब तलक तो सूख जाएगी नदी विश्वास की.

आभारी हूँ.