हर क़दम पर खौफ़ की सरदारियाँ रहने लगें
काफिलों में जब कभी ग़द्दारियाँ रहने लगें
नीयतें बद और कुछ बदकारियाँ रहने लगें
सरहादों पर क्यों न गोलाबारियाँ रहने लगें
हर तरफ़ लाचारियाँ,दुशवारियाँ रहने लगें
सरपरस्ती में जहाँ मक्कारियाँ रहने लगें
हर तरफ़ ऐसे हक़ीमों की अजब—सी भीड़ है
चाहते हैं जो यहाँ बीमारियाँ रहने लगें
फिर ख़ुराफ़त के जंगल ही क्यों न उग आएँ वहाँ
ज़ेह्न में अकसर जहाँ बेकारियाँ रहने लगें
क्यों न सच आकर हलक में ही अटक जाए कहो
गरदनों पर जब हमेशा आरियाँ रहने लगें
उनकी बातों में है जितना झूठ सब जल जाएगा
आपकी आँखों में गर चिंगारियाँ रहने लगें
है महक मुमकिन तभी सारे ज़माने के लिए
सोच में ‘द्विज’, कुछ अगर फुलवारियाँ रहने लगें.
पतझड़ में प्रेम
2 weeks ago
