द्विजेन्द्र "द्विज"

द्विजेन्द्र "द्विज" एक सुपरिचित ग़ज़लकार हैं और इसके साथ-साथ उन्हें प्रख्यात साहित्यकार श्री सागर "पालमपुरी" के सुपुत्र होने का सौभाग्य भी प्राप्त है। "द्विज" को ग़ज़ल लिखने की जो समझ हासिल है, उसी समझ के कारण "द्विज" की गज़लें देश और विदेश में सराही जाने लगी है। "द्विज" का एक ग़ज़ल संग्रह संग्रह "जन-गण-मन" भी प्रकाशित हुआ है जिसे साहित्य प्रेमियों ने हाथों-हाथ लिया है। उनके इसी ग़ज़ल संग्रह ने "द्विज" को न केवल चर्चा में लाया बल्कि एक तिलमिलाहट पैदा कर दी। मैं भी उन्ही लोगों में एक हूं जो "द्विज" भाई क़ी गज़लों के मोहपाश में कैद है। "द्विज" भाई की ग़ज़लें आपको कैसी लगी? मुझे प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी!
********************प्रकाश बादल************************

Sunday, 4 January 2009

ग़जल

Posted by Prakash Badal

जो लड़ें जीवन की सब संभावनाओं के ख़िलाफ़।

हम हमेशा ही रहे उन भूमिकाओं के ख़िलाफ़।


जो ख़ताएँ कीं नहीं , उन पर सज़ाओं के ख़िलाफ़,

किस अदालत में चले जाते ख़ुदाओं के ख़िलाफ़।


जिनकी हमने बन्दगी की , देवता माना जिन्हें,

वो रहे अक्सर हमारी आस्थाओं के ख़िलाफ़।


ज़ख़्म तू अपने दिखाएगा भला किसको यहाँ,

यह सदी पत्थर—सी है संवेदनाओं के ख़िलाफ़।


सामने हालात की लाएँ जो काली सूरतें,

हैं कई अख़बार भी उन सूचनाओं के ख़िलाफ़।


ठीक भी होता नहीं मर भी नहीं पाता मरीज़,

कीजिए कुछ तो दवा ऐसी दवाओं के ख़िलाफ़।


आदमी से आदमी, दीपक से दीपक दूर हों,

आज की ग़ज़लें हैं ऐसी वर्जनाओं के ख़िलाफ़।


जो अमावस को उकेरें चाँद की तस्वीर में,

थामते हैं हम क़लम उन तूलिकाओं के ख़िलाफ़।


रक्तरंजित सुर्ख़ियाँ या मातमी ख़ामोशियाँ,

सब गवाही दे रही हैं कुछ ख़ुदाओं के ख़िलाफ़।


आख़िरी पत्ते ने बेशक चूम ली आख़िर ज़मीन,

पर लड़ा वो शान से पागल हवाओं के ख़िलाफ़।


‘एक दिन तो मैं उड़ा ले जाऊँगी आख़िर तुम्हें,

ख़ुद हवा पैग़ाम थी काली घटाओं के ख़िलाफ़।

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