द्विजेन्द्र "द्विज"

द्विजेन्द्र "द्विज" एक सुपरिचित ग़ज़लकार हैं और इसके साथ-साथ उन्हें प्रख्यात साहित्यकार श्री सागर "पालमपुरी" के सुपुत्र होने का सौभाग्य भी प्राप्त है। "द्विज" को ग़ज़ल लिखने की जो समझ हासिल है, उसी समझ के कारण "द्विज" की गज़लें देश और विदेश में सराही जाने लगी है। "द्विज" का एक ग़ज़ल संग्रह संग्रह "जन-गण-मन" भी प्रकाशित हुआ है जिसे साहित्य प्रेमियों ने हाथों-हाथ लिया है। उनके इसी ग़ज़ल संग्रह ने "द्विज" को न केवल चर्चा में लाया बल्कि एक तिलमिलाहट पैदा कर दी। मैं भी उन्ही लोगों में एक हूं जो "द्विज" भाई क़ी गज़लों के मोहपाश में कैद है। "द्विज" भाई की ग़ज़लें आपको कैसी लगी? मुझे प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी!
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Wednesday, 10 December 2008

ग़ज़ल

Posted by Prakash Badal

फ़स्ल सारी आप बेशक अपने घर ढुलवाइए।

चंद दाने मेरे हिस्से के मुझे दे जाइए।


तैर कर ख़ुद पार कर लेंगे यहाँ हम हर नदी,

आप अपनी कश्तियों को दूर ही ले जाइए।


रतजगे मुश्किल हुए हैं अब इन आँखों के लिए,

ख़त्म कब होगी कहानी ये हमें बतलाइए।


कब तलक चल पाएगी ये आपकी जादूगरी,

पट्टियां आँखों पे जो हैं अब उन्हें खुलवाइए।


ये अँधेरा बंद कमरा, आप ही की देन है,

आप इसमें क़ैद हो कर चीखिए चिल्लाइए।


सच बयाँ करने की हिम्मत है अगर बाक़ी बची,

आँख से देखा वहाँ जो सब यहाँ लिखवाइए।


फिर न जाने बादशाहत का बने क्या आपकी,

नफ़रतों को दूर ले जाकर अगर दफनाइए।

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