द्विजेन्द्र "द्विज"

द्विजेन्द्र "द्विज" एक सुपरिचित ग़ज़लकार हैं और इसके साथ-साथ उन्हें प्रख्यात साहित्यकार श्री सागर "पालमपुरी" के सुपुत्र होने का सौभाग्य भी प्राप्त है। "द्विज" को ग़ज़ल लिखने की जो समझ हासिल है, उसी समझ के कारण "द्विज" की गज़लें देश और विदेश में सराही जाने लगी है। "द्विज" का एक ग़ज़ल संग्रह संग्रह "जन-गण-मन" भी प्रकाशित हुआ है जिसे साहित्य प्रेमियों ने हाथों-हाथ लिया है। उनके इसी ग़ज़ल संग्रह ने "द्विज" को न केवल चर्चा में लाया बल्कि एक तिलमिलाहट पैदा कर दी। मैं भी उन्ही लोगों में एक हूं जो "द्विज" भाई क़ी गज़लों के मोहपाश में कैद है। "द्विज" भाई की ग़ज़लें आपको कैसी लगी? मुझे प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी!
********************प्रकाश बादल************************

Tuesday, 2 December 2008

ग़ज़ल

Posted by Prakash Badal

अँधेरे चंद लोगों का अगर मक़सद नहीं होते।

यहाँ के लोग अपने आप में सरहद नहीं होते


न भूलो, तुमने ये ऊँचाईयाँ भी हमसे छीनी हैं,

हमारा क़द नहीं लेते तो आदमक़द नहीं होते।


फ़रेबों की कहानी है तुम्हारे मापदण्डों में,

वगरना हर जगह बौने कभी अंगद नहीं होते।


तुम्हारी यह इमारत रोक पाएगी हमें कब तक,

वहाँ भी तो बसेरे हैं जहाँ गुम्बद नहीं होते।


चले हैं घर से तो फिर धूप से भी जूझना होगा,

सफ़र में हर जगह सुन्दर— घने बरगद नही होते।

blogarama - the blog directory चिट्ठाजगतwww.blogvani.com