द्विजेन्द्र "द्विज"

द्विजेन्द्र "द्विज" एक सुपरिचित ग़ज़लकार हैं और इसके साथ-साथ उन्हें प्रख्यात साहित्यकार श्री सागर "पालमपुरी" के सुपुत्र होने का सौभाग्य भी प्राप्त है। "द्विज" को ग़ज़ल लिखने की जो समझ हासिल है, उसी समझ के कारण "द्विज" की गज़लें देश और विदेश में सराही जाने लगी है। "द्विज" का एक ग़ज़ल संग्रह संग्रह "जन-गण-मन" भी प्रकाशित हुआ है जिसे साहित्य प्रेमियों ने हाथों-हाथ लिया है। उनके इसी ग़ज़ल संग्रह ने "द्विज" को न केवल चर्चा में लाया बल्कि एक तिलमिलाहट पैदा कर दी। मैं भी उन्ही लोगों में एक हूं जो "द्विज" भाई क़ी गज़लों के मोहपाश में कैद है। "द्विज" भाई की ग़ज़लें आपको कैसी लगी? मुझे प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी!
********************प्रकाश बादल************************

Monday, 8 December 2008

ग़ज़ल

Posted by Prakash Badal

परों को काट के क्या आसमान दीजिएगा।
ज़मीन दीजिएगा या उड़ान दीजिएगा।

हमारी बात को भी अपने कान दीजिएगा,
हमारे हक़ में भी कोई बयान दीजिएगा।

ज़बान, ज़ात या मज़हब यहाँ न टकराएँ,
हमें हुज़ूर, वो हिन्दोस्तान दीजिएगा।

रही हैं धूप से अब तक यहाँ जो नावाक़िफ़,
अब ऐसी बस्तियों पे भी तो ध्यान दीजिएगा।

है ज़लज़लों के फ़सानों का बस यही वारिस,
सुख़न को आप नई —सी ज़बान दीजिएगा।

कभी के भर चुके हैं सब्र के ये पैमाने,
ज़रा—सा सोच—समझकर ज़बान दीजिएगा।

जो छत हमारे लिए भी यहाँ दिला पाए,
हमें भी ऐसा कोई संविधान दीजिएगा।

नई किताब बड़ी दिलफ़रेब है लकिन,
पुरानी बात को भी क़द्र्दान दीजिएगा।

जुनूँ के नाम पे कट कर अगर है मर जाना,
ये पूजा किसके लिए,क्यों अज़ान दीजिएगा।

अजीब शह्र है शहर—ए—वजूद भी यारो,
क़दम—क़दम पे जहाँ इम्तहान दीजिएगा।

क़लम की नोंक पे हों तितलियाँ ख़्यालों की,
क़लम के फूलों को वो बाग़बान दीजिएगा।

जो हुस्नो—इश्क़ की वादी से जा सके आगे,
ख़याल—ए— शायरी को वो उठान दीजिएगा।

ये शायरी तो नुमाइश नहीं है ज़ख़्मों की,
फिर ऐसी चीज़ को कैसे दुकान दीजिएगा।

जो बचना चाहते हो टूट कर बिखरने से,
‘द्विज’, अपने पाँवों को कुछ तो थकान दीजिएगा।

Friday, 5 December 2008

Posted by Prakash Badal

बाँध कर दामन से अपने झुग्गियाँ लाई ग़ज़ल।

इसलिए शायद न अबके आप को भाई ग़ज़ल।


आपके भाषण तो सुन्दर उपवनों के स्वप्न हैं,

ज़िन्दगी फिर भी हमारी क्यों है मुर्झाई ग़ज़ल।


माँगते हैं जो ग़ज़ल सीधी लकीरों की तरह,

काश वो भी पूछते, है किसने उलझाई ग़ज़ल।


इक ग़ज़ब की चीख़ महव—ए—गुफ़्तगू हमसे रही,

हमने सन्नाटों के आगे शौक़ से गाई ग़ज़ल।


आप मानें या न मानें यह अलग इक बात है,

हर तरफ़ यूँ तो है वातावरण पे छाई ग़ज़ल।

Wednesday, 3 December 2008

ग़ज़ल

Posted by Prakash Badal

बराबर चल रहे हो और फिर भी घर नहीं आता
तुम्हें यह सोचकर लोगो, कभी क्या डर नहीं आता

अगर भटकाव लेकर राह में रहबर नहीं आता,
किसी भी क़ाफ़िले की पीठ पर ख़ंजर नहीं आता


तुम्हारे ज़ेह्न में गर फ़िक्र मंज़िल की रही होती,
कभी भटकाव का कोई कहीं मंज़र नहीं आता

तुम्हारी आँख गर पहचान में धोखा नहीं खाती,
कोई रहज़न कभी बन कर यहाँ रहबर नहीं आता

लहू की क़ीमतें गर इस क़दर मन्दी नहीं होतीं,
लहू से तर—ब—तर कोई कहीं ख़ंजर नहीं आता।

अगर गलियों में बहते ख़ून का मतलब समझ लेते,
तुम्हारे घर के भीतर आज यह लशकर नहीं आता।

तुम्हारे दिल सुलगने का यक़ीं कैसे हो लोगों को,
अगर सीने में शोला है तो क्यों बाहर नहीं आता।

Tuesday, 2 December 2008

ग़ज़ल

Posted by Prakash Badal

अँधेरे चंद लोगों का अगर मक़सद नहीं होते।

यहाँ के लोग अपने आप में सरहद नहीं होते


न भूलो, तुमने ये ऊँचाईयाँ भी हमसे छीनी हैं,

हमारा क़द नहीं लेते तो आदमक़द नहीं होते।


फ़रेबों की कहानी है तुम्हारे मापदण्डों में,

वगरना हर जगह बौने कभी अंगद नहीं होते।


तुम्हारी यह इमारत रोक पाएगी हमें कब तक,

वहाँ भी तो बसेरे हैं जहाँ गुम्बद नहीं होते।


चले हैं घर से तो फिर धूप से भी जूझना होगा,

सफ़र में हर जगह सुन्दर— घने बरगद नही होते।

Sunday, 23 November 2008

ग़ज़ल

Posted by Prakash Badal

ये कौन छोड़ गया इस पे ख़ामियाँ अपनी|

मुझे दिखाता है आईना झुर्रियाँ अपनी|


बना के छाप लो तुम उनको सुर्ख़ियाँ अपनी,

कुएँ में डाल दीं हमने तो नेकियाँ अपनी|


बदलते वक़्त की रफ़्तार थामते हैं हुज़ूर !

बदलते रहते हैं अकसर जो टोपियाँ अपनी|


ज़लील होता है कब वो उसे हिसाब नहीं,

अभी तो गिन रहा है वो दिहाड़ियाँ अपनी|


नहीं लिहाफ़, ग़िलाफ़ों की कौन बात करे,

तू देख फिर भी गुज़रती हैं सर्दियाँ अपनी|


क़तारें देख के लम्बी हज़ारों लोगों की,

मैं फाड़ देता हूँ अकसर सब अर्ज़ियाँ अपनी|


यूँ बात करता है वो पुर-तपाक लहज़े में,

मगर छुपा नहीं पाता वो तल्ख़ियाँ अपनी|


भले दिनों में कभी ये भी काम आएँगी"

अभी सँभाल के रख लो उदासियाँ अपनी|


हमें ही आँखों से सुनना नहीं आता उनको,

सुना ही देते हैं चेहरे कहानियाँ अपनी|


मेरे लिये मेरी ग़ज़लें हैं कैनवस की तरह,

उकेरता हूँ मैं जिन पर उदासियाँ अपनी|


तमाम फ़ल्सफ़े ख़ुद में छुपाए रहती हैं,

कहीं हैं छाँव कहीं धूप वादियाँ अपनी|


अभी जो धुन्ध में लिपटी दिखाई देती है,

कभी तो धूप नहायेंगी बस्तियाँ अपनी|


बुलन्द हौसलों की इक मिसाल हैं ये भी,

पहाड़ रोज़ दिखाते हैं चोटियाँ अपनी|


बुला रही है तुझे धूप ‘द्विज’ पहाड़ों की,

तू खोलता ही नहीं फिर भी खिड़कियाँ अपनी|


Saturday, 22 November 2008

ग़ज़ल/22/11/2008

Posted by Prakash Badal


ख़ुद तो जी हमेशा ही तिश्नगी पहाड़ों ने
सागरों को दी लेकिन हर नदी पहाड़ों ने

आदमी को बख़्शी है ज़िन्दगी पहाड़ों ने।
आदमी से पाई है बेबसी पहाड़ों ने।

हर क़दम निभाई है दोस्ती पहाड़ों ने।
हर क़दम पे पाई है बेरुख़ी पहाड़ों ने।

मौसमों से टकरा कर हर क़दम पे दी,
सबके जीने के इरादों को पुख़्तगी पहाड़ों ने

देख हौसला इनका और शक्ति सहने की !
टूट कर बिखर के भी उफ़ न की पहाड़ों ने।

नीलकंठ शैली में विष स्वयं पिए सारे,
पर हवा को बख़्शी है ताज़गी पहाड़ों ने।

रोक रास्ता उनका हाल जब कभी पूछा,
बादलों को दे दी है नग़्मगी पहाड़ों ने।

लुट-लुटा के हँसने का योगियों के दर्शन सा,
हर पयाम भेजा है दायिमी पहाड़ों ने।

सबको देते आए हैं नेमतें अज़ल से,
ये ‘द्विज’ को भी सिखाई है शायरी पहाड़ों ने।


Thursday, 20 November 2008

ग़ज़ल/21/11/2008

Posted by Prakash Badal

औज़ार बाँट कर ये सभी तोड़—फोड़ के
रक्खोगे किस तरह भला दुनिया को जोड़ के

ख़ूँ से हथेलियों को ही करना है तर—ब—तर
पानी तो आएगा नहीं पत्थर निचोड़ के

बेशक़ इन आँसुओं को तू सीने में क़ैद रख
नदियाँ निकल ही आएँगी पर्वत को फोड़ के

तूफ़ान साहिलों पे बहुत ही शदीद हैं
ले जाऊँ अब कहाँ मैं सफ़ीने को मोड़ के

शामिल ही नहीं इसमें हुनरमंद लोग अब
इतने कड़े नियम हैं ज़माने में होड़ के

रहते हैं लाजवाब अब ऐसे सवाल ‘द्विज’!
पूछे तेरा ज़मीर जो तुझको झंझोड़ के

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