इसी तरह से ये काँटा निकाल देते हैं
हम अपने दर्द को ग़ज़लों में ढाल देते हैं
हमारी नींदों में अक्सर जो डालती हैं ख़लल
वो ऐसी बातों को दिल से निकाल देते हैं
हमारे कल की ख़ुदा जाने शक़्ल क्या होगी
हर एक बात को हम कल पे टाल देते हैं
कहीं दिखे ही नहीं गाँवों में वो पेड़ हमें
बुज़ुर्ग साये की जिनके मिसाल देते हैं
कमाल ये है वो गोहरशनास हैं ही नहीं
जो इक नज़र में समंदर खंगाल देते है
वो सारे हादसे हिम्मत बढ़ा गए ‘द्विज’ की
कि जिनके साये ही दम-ख़म पिघाल देते हैं
चांदनी रातें - भारत में रूस की बातें
5 weeks ago
22 comments:
हमारे कल की ख़ुदा जाने शक़्ल क्या होगी
हर एक बात को हम कल पे टाल देते हैं
आपका जवाब नहीं.........आपकी यह ग़ज़ल सभी की आत्मानुभूति को व्यक्त करती हैं.........बहुत खूब
बहुत सुंदर गजल जी.
धन्यवाद
कहीं दिखे ही नहीं गाँवों में वो पेड़ हमें
बुज़ुर्ग साये की जिनके मिसाल देते हैं ..
जी कमाल की ग़ज़ल और बहुत ही लाजवाब शेर ... जैसे मिट्टी की सोंधी सोंधी महक आ रही हो ......
अभी अभी 'ब्लॉगवाणी' खोल कर देखना शुरू ही किया था
कि आपका फोटो और गज़ल दीखि तो पढ़े बिना रहा ही
नही गया। अच्छी सुंदर गज़ल है बधाई -
हमारी नीदों में जो डालती है खलल
वो ऐसी बातों को दिल से निकाल देते हैं।
बहुत सुंदर बधाई
कहीं दिखे ही नहीं गाँवों में वो पेड़ हमें
बुज़ुर्ग साये की जिनके मिसाल देते हैं
bahut khoob...
कहीं दिखे ही नहीं गाँवों में वो पेड़ हमें
बुज़ुर्ग साये की जिनके मिसाल देते हैं ..
बहुत उम्दा ग़ज़ल!
Kamaal !!!!
Har sher gazab hai bhai !!!
हमारे कल की ख़ुदा जाने शक़्ल क्या होगी
हर एक बात को हम कल पे टाल देते हैं
..............वाह
..............वाह
..............वाह
हमारे कल की ख़ुदा जाने शक़्ल क्या होगी
हर एक बात को हम कल पे टाल देते हैं
गहरा शे'र ...
ज़्यादा गौर से देखें तो इसे पढ़ कर कल के नाम से ही घबराहट होने लगती है...
हमारे कल कि खुदा जाने शक्ल क्या होगी...
मगर मक्ता.....
जिंदगी को हिम्मत से लबालब भर देने वाला.....
वो सारे हादसे हिम्मत बढ़ा गए ‘द्विज’ की
कि जिनके साये ही दम-ख़म पिघाल देते हैं
be
बेहद asardaar...
अरे वाह, लाजवाब कर दिया आपने। बहुत बहुत बधाई।
--------
बूझ सको तो बूझो- कौन है चर्चित ब्लॉगर?
पत्नियों को मिले नार्को टेस्ट का अधिकार?
द्विज जी की गज़लों को आहिस्ता-आहिस्ता पीता हूँ..भर-भर जाता हूँ !
इस शेर ने खूब आनन्द दिया -
"हमारे कल की ख़ुदा जाने शक़्ल क्या होगी
हर एक बात को हम कल पे टाल देते हैं "
हमारे कल की ख़ुदा जाने शक़्ल क्या होगी
हर एक बात को हम कल पे टाल देते हैं
WOW !!!!
kya likhaa hai, gazab...
द्विज जी,
बेहद सुंदर ग़ज़ल.
ये दो शेर खास तौर पर पसंद आये:
"हमारी नींदों में अक्सर जो डालती हैं ख़लल
वो ऐसी बातों को दिल से निकाल देते हैं
हमारे कल की ख़ुदा जाने शक़्ल क्या होगी
हर एक बात को हम कल पे टाल देते हैं "
कहीं दिखे ही नहीं गाँवों में वो पेड़ हमें
बुज़ुर्ग साये की जिनके मिसाल देते हैं
Aap hi ki kalam ho sakti hai.
Agli post ka intzaar hai.
कहीं दिखे ही नहीं गाँवों में वो पेड़ हमें
बुज़ुर्ग साये की जिनके मिसाल देते हैं ..
Time is moving fast. World is changing. People are growing selfish. All are busy with themselves. No time to look back and bother about others...
"Ab na rahe wo peene wale,
Ab na rahi wo madhushala."
सुंदर ग़ज़ल..
उस्तादाना शेरों पर बस निशब्द ही हूँ। अद्भुत है आपकी शायरी। शुभकामनायें।
इसी तरह से ये काँटा निकाल देते हैं
हम अपने दर्द को ग़ज़लों में ढाल देते हैं
कमाल ये है वो गोहरशनास हैं ही नहीं
जो इक नज़र में समंदर खंगाल देते है
वाह ! बहुत ख़ूब !
वाक़ई यही स्थिति है कि सच्चे मोती निकालना तो दूर की बात है पहले उसे हम पहचानें तो
अगली पोस्ट का इंतज़ार है.
कम लिखते है, पर लिखते है उम्दा,
ऐसे हुनर की 'मजाल' दाद देते है!
प्रकाश भाई,
मैं और द्विजेन्द्र भाई अनगिन पत्रिकाओं में साथ-साथ छपे हैं। उन्हें ब्लॉगिंग में देखकर और पढ़कर खुशी हुई।
मेरा ‘नमस्कार’ उन तक पहुँचा सकें तो आभारी रहूँगा। अग्रिम धन्यवाद स्वीकारें!
WAHH ..SIR ..KYA FARMAYA HAI
Post a Comment