द्विजेन्द्र "द्विज"

द्विजेन्द्र "द्विज" एक सुपरिचित ग़ज़लकार हैं और इसके साथ-साथ उन्हें प्रख्यात साहित्यकार श्री सागर "पालमपुरी" के सुपुत्र होने का सौभाग्य भी प्राप्त है। "द्विज" को ग़ज़ल लिखने की जो समझ हासिल है, उसी समझ के कारण "द्विज" की गज़लें देश और विदेश में सराही जाने लगी है। "द्विज" का एक ग़ज़ल संग्रह संग्रह "जन-गण-मन" भी प्रकाशित हुआ है जिसे साहित्य प्रेमियों ने हाथों-हाथ लिया है। उनके इसी ग़ज़ल संग्रह ने "द्विज" को न केवल चर्चा में लाया बल्कि एक तिलमिलाहट पैदा कर दी। मैं भी उन्ही लोगों में एक हूं जो "द्विज" भाई क़ी गज़लों के मोहपाश में कैद है। "द्विज" भाई की ग़ज़लें आपको कैसी लगी? मुझे प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी!
********************प्रकाश बादल************************

Thursday, 21 May 2009

जितना दिखता हूँ मुझे उससे ज़ियादा समझ
इस ज़मीं का हूँ मुझे कोई फ़रिश्ता समझ

जो तक़ल्लुफ़ है उसे हर्फ़े-तमन्ना समझ
मुस्कुराहट को मुहब्बत का इशारा समझ

यह तेरी आँख के धोखे के सिवा कुछ भी नहीं
एक बहते हुए दरिया को किनारा समझ

एक दिन चीर के निकलेंगे वो तेरी आँतें
वो भी इन्साँ हैं उन्हें अपना निवाला समझ

वह तुझे बाँटने आया है कई टुकड़ों में
मुस्कुराते हुए शैताँ को मसीहा समझ

जिन किताबों ने अँधेरों के सिवा कुछ दिया
उन किताबों के उजाले को उजाला समझ

छोड़ जाएगा तेरा साथ अँधेरे में यही
यह जो साया है तेरा इसको भी अपना समझ

यह जो बिफरा तो डुबोएगा सफ़ीने कितने
तू इसे आँख से टपका हुआ क़तरा समझ

है तेरे साथ अगर तेरे इरादों का जुनूँ
क़ाफ़िला है तू अभी ख़ुद को अकेला समझ

तुझ से ही माँग रहा है वो तो ख़ुद अपना वजूद
ख़ुद भिखारी है उसे कोई ख़लीफ़ा समझ

बढ़ कुछ आगे तो मिलेंगे तुझे मंज़र भी हसीं
इन पहाड़ों के कुहासे को कुहासा समझ

साथ मेरे हैं बुज़ुर्गों की दुआएँ इतनी
मैं हूँ महफ़िल तू मुझे आज भी तनहा समझ

शायरी आज भी उनकी है नईद्विजख़ुद को
ग़ालिब--मीर या मोमिन से भी ऊँचा समझ

34 comments:

रंजना said...

हर शेर सीधे मर्म में बसने योग्य है....अद्वितीय.....
बहुत बहुत सुन्दर भाव और गजब की शब्द कलाकारी....वाह !!

शारदा अरोरा said...

बहुत शानदार , वजनदार फिर भी हल्के फुल्के मूड में रखे हुए है ये ग़ज़ल , वाह वाह |

raj said...

छोड़ जाएगा तेरा साथ अँधेरे में यही
यह जो साया है तेरा इसको भी अपना न समझ...
मैं हूँ महफ़िल तू मुझे आज भी तनहा न समझ...aapke sath hmesha duaeye rahe....tanha na rahe....sunder post....sunder ko sunder hi kahte hai na....

डॉ .अनुराग said...

जितना दिखता हूँ मुझे उससे ज़ियादा न समझ
इस ज़मीं का हूँ मुझे कोई फ़रिश्ता न समझ

bahut achhe ......

मीत said...

क्या बात है साहब ..... कमाल के शेर हैं ..... ये शेर तो साथ रह गया :

यह जो बिफरा तो डुबोएगा सफ़ीने कितने
तू इसे आँख से टपका हुआ क़तरा न समझ

कमाल है भाई ....

श्रद्धा जैन said...

जितना दिखता हूँ मुझे उससे ज़ियादा न समझ
इस ज़मीं का हूँ मुझे कोई फ़रिश्ता न समझ

वह तुझे बाँटने आया है कई टुकड़ों में
मुस्कुराते हुए शैताँ को मसीहा न समझ

जिन किताबों ने अँधेरों के सिवा कुछ न दिया
उन किताबों के उजाले को उजाला न समझ

तुझ से ही माँग रहा है वो तो ख़ुद अपना वजूद
ख़ुद भिखारी है उसे कोई ख़लीफ़ा न समझ

शायरी आज भी उनकी है नई ‘द्विज’ ख़ुद को
ग़ालिब-ओ-मीर या मोमिन से भी ऊँचा न समझ

kis kis sher ki taarif karun
har sher kamaal har sher ek naye khyaal liye
dil tak jaane wali gazal padhwane ke liye shukriya Prakaash ji

विवेक said...

आप शायरी में जिस तरह पंक्ति में खड़े आखिरी आदमी की बात करते हैं ना...बस दिल जीत लेते हैं

venus kesari said...

साथ मेरे हैं बुज़ुर्गों की दुआएँ इतनी
मैं हूँ महफ़िल तू मुझे आज भी तनहा न समझ


क्या बात है ...

वीनस केसरी

हिमांशु । Himanshu said...

"जिन किताबों ने अँधेरों के सिवा कुछ न दिया
उन किताबों के उजाले को उजाला न समझ"

गजलें भीतर तक की संवेदना को झकझोरती हैं । इन पंक्तियों ने तो अर्थ के अनेकानेक स्तर उद्घाटित किये । आभार ।

"अर्श" said...

बादल जी इस खुबसूरत से ग़ज़ल को पढ़वाने कोई लिए बहोत ही शुक्रगुजार हूँ आपका , बड़े भाई और गुरु सरीखे श्री द्विज जी कोई ग़ज़ल गोई कोई क्या कहने ... हर शे'र उम्दा है हर शे'र में उनका चेहरा झलकता है ... सलाम उनको तथा उनके लेखनी को ... और आपका इसके लिए आभार...

अर्श

सतपाल said...

paireeN paina sir
saadar khyaal

नीरज गोस्वामी said...

ये शायरी उस्तादों वाली शायरी है...जिस तक पहुँचने की हसरत हर लिखने वाला रखता है...बेमिसाल शेर कहें है द्विज जी ने...हम जैसे नौसीखियों को उन्हें पढने से कितना कुछ सीखने को मिलता है...:

जो तक़्क़ल्लुफ़ है उसे हर्फ़े-तमन्ना न समझ
मुस्कुराहट को मुहब्बत का इशारा न समझ

यह तेरी आँख के धोखे के सिवा कुछ भी नहीं
एक बहते हुए दरिया को किनारा न समझ

एक दिन चीर के निकलेंगे वो तेरी आँतें
वो भी इन्साँ हैं उन्हें अपना निवाला न समझ

हर शेर पर वाह वाह कहता नहीं थक रहा...दिल है की बार बार पढने के बावजूद और और की जिद कर रहा है...जितनी बार पढता हूँ उतनी बार पहले से ज्यादा मजा आता है...शायरी नहीं जादूगरी है ये...
नीरज

दिगम्बर नासवा said...

द्विज जी .......लाजवाब लिखा है...........हर शेर में नयापन, लगता है आज के हालत हूबहू उतार दिए हैं...........शेरों के बहाने............कितनी मस्ती, कितना पैना पन लिए..........कितने प्रवाह में है .........बस सुभान अल्ला ही निकलता है हर शेर पर...............

योगेन्द्र मौदगिल said...

बढ़िया ग़ज़ल कही है आपने... बधाई स्वीकारें..

Dr. Sudha Om Dhingra said...

द्विजेन्द्र जी,
क्या ग़ज़ल कही है--वाह
किसकी तारीफ करूँ, किसे छोडूँ.
यह जो बिफरा तो डुबोएगा सफ़ीने कितने
तू इसे आँख से टपका हुआ क़तरा न समझ

Yogesh said...

dwij ji,

जो शेर मुझे पसन्द और सब से अच्छे से समझ आया, वो बहुत ही खूबसूरत है

[b]यह तेरी आँख के धोखे के सिवा कुछ भी नहीं
एक बहते हुए दरिया को किनारा न समझ

शायरी आज भी उनकी है नई ‘द्विज’ ख़ुद को
ग़ालिब-ओ-मीर या मोमिन से भी ऊँचा न समझ[/b]

कुछ शेर जो समझ नहीं सका मैं वो ये हैं

बढ़ कुछ आगे तो मिलेंगे तुझे मंज़र भी हसीं
इन पहाड़ों के कुहासे को कुहासा न समझ

ये वाला शेर किसके लिये है?

एक दिन चीर के निकलेंगे वो तेरी आँतें
वो भी इन्साँ हैं उन्हें अपना निवाला न समझ

गज़ल बहुत ही खूबसूरत हुई है, मगर या तो ये आम आदमी की भाषा से दूर है, या फिर मे्री vocabulary काफी ज़्यादा कमज़ोर है

गौतम राजरिशी said...

शुक्रिया प्रकाश भाई वापसी का....कब से तरसती आँखों को अब फिर से श्रद्धेय द्विज जी के शेरों की जदुगरी, काफ़ियों का तिलिस्म अब मिलता रहेगा...

" है तेरे साथ अगर तेरे इरादों का जुनूँ/क़ाफ़िला है तू अभी ख़ुद को अकेला न समझ" उनके ऐसे ही तेवरों के हम दीवाने हैं
और ’मैं हूं महफ़िल.." वाला शेर तो बस माथे से लगा कर रखने वाला है

Dr. Amar Jyoti said...

'जिन किताबों ने…'
'वो तुझे बांटने आया है…'
'ये जो बिफ़रा तो…'
'है तेरे साथ अगर…'
'बढ़ कुछ आगे तो…'
बहुत, बहुत, बहुत, ही ख़ूब! एक से बढ़ कर एक
नायाब शेर।

P.D said...
This comment has been removed by the author.
sandhyagupta said...

जिन किताबों ने अँधेरों के सिवा कुछ न दिया
उन किताबों के उजाले को उजाला न समझ....

छोड़ जाएगा तेरा साथ अँधेरे में यही
यह जो साया है तेरा इसको भी अपना न समझ

Sundar.Atyant sundar.

hemjyotsana said...

एक दिन चीर के निकलेंगे वो तेरी आँतें
वो भी इन्साँ हैं उन्हें अपना निवाला न समझ

साथ मेरे हैं बुज़ुर्गों की दुआएँ इतनी
मैं हूँ महफ़िल तू मुझे आज भी तनहा न समझ

शायरी आज भी उनकी है नई ‘द्विज’ ख़ुद को
ग़ालिब-ओ-मीर या मोमिन से भी ऊँचा न समझ

waah bahut bahut umda ghazal
daad kabul kare hamari bhi


saadar

श्याम कोरी 'उदय' said...

वह तुझे बाँटने आया है कई टुकड़ों में
मुस्कुराते हुए शैताँ को मसीहा न समझ
... बहुत खूब शेर ... बेहद खूबसूरत गजल !!!

महावीर said...

निहायत ख़ूबसूरत ग़ज़ल लिखी है आपने. इसमें तो शक ही नहीं कि आपके ग़ज़ल लिखने
का अंदाज़े-बयां अनूठा है. बहरों और लफ़्जों के चुनाव पर आपका उबूर है. इस ग़ज़ल में यह सोचना मुश्किल हो जाता है कि कौन सा शेर पूरी ग़ज़ल पर हावी है. सब ही एक से एक बढ़
कर हैं. शुरू में ही मतले से ही बहुत प्रभावित हुआ हूँ.
ये अशआर बहुत पसंद आए:-
यह तेरी आँख के धोखे के सिवा कुछ भी नहीं
एक बहते हुए दरिया को किनारा न समझ

जिन किताबों ने अँधेरों के सिवा कुछ न दिया
उन किताबों के उजाले को उजाला न समझ

है तेरे साथ अगर तेरे इरादों का जुनूँ
क़ाफ़िला है तू अभी ख़ुद को अकेला न समझ
बहुत ख़ूबसूरत.

manu said...

भाई जी,
माफ़ी माँगता हूँ ....पहले इसे मैंने किसी और ही तरह से पढना शुरू किया....
असल में 'न' को ''ना'' पढ़ रहा था,,
फिर तीसरे शेर पर ''आँख'' शब्द पर आकर अटका,,,,,
अब आपकी गजल है तो या तो मिस-प्रिंटिंग है या मेरी कमी,,,,
फिर दोबारा पढा तो मेरी ही कमी निकली.....ये लिखना जरूरी तो नहीं पर लिख रहा हूँ...
पुरानी आदत है ,,जाते जाते ही जायेगी,,,..''न'' को अपनी मर्जी से गुरू लघु करने की...
:::)))))

योगेश जी,,,
आम आदमी की भाषा में ही है ये गजल,,,,
यूं भी एक दम आम आदमी के लिए कही गयी है,,,,
कहने वाला आम नहीं है ये और बात ,,,,,

साथ मेरे हैं बुज़ुर्गों की दुआएँ इतनी
मैं हूँ महफ़िल तू मुझे आज भी तनहा न समझ

शायरी आज भी उनकी है नई ‘द्विज’ ख़ुद को
ग़ालिब-ओ-मीर या मोमिन से भी ऊँचा न समझ

वो जो मतला है ...कमाल का है.....
मक्ता भी लाजवाब..
और ""मैं हूँ महफ़िल,,,,,,,,,,,,
कमाल,,,वाकई आप अपने आप में एक पूरी महफ़िल हैं,,,,
शायद इसीलिए ऑनलाइन होते हुए भी आपके जिन्दगी से भरपूर ठहाके सुनने के लिए फोन मिलाना पड़ता है........

महफूज़ अली said...

बढ़ कुछ आगे तो मिलेंगे तुझे मंज़र भी हसीं
इन पहाड़ों के कुहासे को कुहासा न समझ

bahut sahi line hai....Sir

sanjiv gautam said...

नीरज जी ने सही कहा है कि ये उस्तादों वाली शायरी है. बहुत कुछ सीखने को मिलता है हम जैसों को. हर शेर लाजवाब!!!!!

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

द्विजेन्द्र जी,
आप जो भी कहे पर मैं तो ये कहूँगा....
"शायरी आज भी उनकी है मगर ‘द्विज’ ख़ुद को
ग़ालिब-ओ-मीर या मोमिन से तू नीचा न समझ"

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

एक नई शुरुआत की है-समकालीन ग़ज़ल पत्रिका और बनारस के कवि/शायर के रूप में...जरूर देखें..आप के विचारों का इन्तज़ार रहेगा....

sandhyagupta said...

Bahut dino se aapne kuch naya post nahin kiya hai.

दर्पण साह "दर्शन" said...

साथ मेरे हैं बुज़ुर्गों की दुआएँ इतनी
मैं हूँ महफ़िल तू मुझे आज भी तनहा न समझ

WAH !!!!

मुकेश कुमार तिवारी said...

द्विज साहब,

बहुत ही सधी हुई ग़जल है, मुझे यह दो शेर अपने बहुत करीब लगे :-

है तेरे साथ अगर तेरे इरादों का जुनूँ
क़ाफ़िला है तू अभी ख़ुद को अकेला न समझ

यह जो बिफरा तो डुबोएगा सफ़ीने कितने
तू इसे आँख से टपका हुआ क़तरा न समझ

सादर,

मुकेश कुमार तिवारी

raj said...

boht der ho gyee likhe....

Aadil Rasheed said...

ismat zaidi ke blog men aapke blog ka link mila aapko padha khushi hui naye labo lehje me sateek baat kahi hai aapne anil janvijay aur lalit ji se kavita kosh me aapke baare me suna tha ghazle aur wo bhi behr me ek sukhad anubhav raha
aadil rasheed
new delhi

Anonymous said...

its just amazing!
wonderful ...........
love you sir!
and thanks for these mesmerizing lines!